1% स्कूल, 29% बजट : शिक्षा में तीखा विभाजन

पिछले 6 सालों से राष्ट्रीय शिक्षा नीति, 2020 का एकतरफा प्रचार किया जा रहा है। यूजीसी और शिक्षा मंत्रालय सहित अनेक सरकारी महकमे इसके प्रचार के लिए तिजोरी खोलकर पैसा लुटा रहे हैं। अच्छा होता कि राष्ट्रीय शिक्षा नीति को केंद्र में रखकर, शिक्षा पर शोध करने वाले शिक्षक और विद्यार्थी इसके विमर्श व नीयत को समझते और एक वैकल्पिक विमर्श की रचना करते। लेकिन विभिन्न सेमिनारों और सम्मेलनों के जरिए स्वस्थ विमर्श के स्थान पर एक खास नैरेटिव गढ़ा जा रहा है। 

राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 के संदर्भ में शिक्षण संस्थानों को राजनीतिक कार्यकर्ताओं के रूप में रूपांतरित कर दिया गया है। ये संस्थान अब अकादमिक केंद्रों की तरह नहीं, बल्कि राजनीतिक और वैचारिक संगठनों के कार्यकर्ताओं की तरह काम कर रहे हैं।

एक ओर तो ’80 बनाम 20′ के सांप्रदायिक नारे के इर्द-गिर्द गोलबंदी की जा रही है, तो दूसरी ओर स्कूली शिक्षा के क्षेत्र में सरकारी स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चों को ‘98% बनाम 2%’ की भयानक असमानता की खाई में धकेल दिया गया है। सरकार ने बजट आवंटन की नीति के जरिए भारत के सरकारी स्कूलों को ‘99% बनाम 1%’ में बांट दिया है। जनता जहाँ ’80 बनाम 20′ जैसे नारों पर मोहित होती रही, वहीं सरकार ने चुपके से इस असमानता को लागू कर दिया गया। सरकार ने सरकारी स्कूलों को ‘1% बनाम 99%’ और वहाँ पढ़ने वाले विद्यार्थियों को ‘2% बनाम 98%’ में किस प्रकार बांटा है, इस पर मैं अभी कुछ देर में विस्तार से बात करूंगा।

उससे पहले, हम शिक्षा नीति को समझने में सहायक दो मुख्य बिंदुओं पर बात कर लेते हैं। प्रोफेसर अनिल सद्गोपाल भारत के जाने-माने शिक्षाविद हैं। उनकी विशेषज्ञता नीतिगत दस्तावेजों को समझने और समझाने में है। मुझे उनके साथ कई वर्षों तक काम करने का अवसर मिला। प्रोफेसर सद्गोपाल ने शिक्षा नीति के विश्लेषण के लिए हमें दो बेहद महत्वपूर्ण बातें बताई थीं। पहली यह कि नीति किसी सरकार की मंशा होती है, जिसके जरिए वह राज्य के इरादों को अभिव्यक्त करती है। नीति यह दर्शाती है कि शिक्षा के क्षेत्र में राज्य की वास्तविक नीयत क्या है।

प्रोफ़ेसर सद्गोपाल ने नीति को समझने की दृष्टि से दूसरी बात यह बताई कि नीति केवल वह दस्तावेज नहीं होती जिसे सरकार संसद द्वारा पारित करवाती है, बल्कि उस नीति को लागू करने के उद्देश्य से विभिन्न मंत्रालयों और विभागों द्वारा समय-समय पर जारी किए जाने वाले आदेश या अधिसूचनाएं भी राज्य की नीति का ही हिस्सा होती हैं।

इस तर्क के हिसाब से शिक्षा के लिए आवंटित होने वाला बजट भी सरकार की शिक्षा-नीति का एक अनिवार्य पक्ष है। इसका अर्थ यह हुआ कि नीति किसी एक समय पर स्थिर हो जाने वाला दस्तावेज नहीं है, बल्कि यह लगातार बनती और बदलती रहती है। इसके बनने और बदलने की अभिव्यक्ति बजट आवंटन तथा समय-समय पर जारी होने वाले सरकारी आदेशों के माध्यम से होती है।

प्रोफ़ेसर सद्गोपाल की इन दो महत्त्वपूर्ण बातों को समझने के लिए राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 से एक उदाहरण लेते हैं। इस नीति में अनेक बुनियादी सिद्धांत लिखे गए हैं और यह दावा किया गया है कि इन्हीं को केंद्र में रखकर पूरी नीति तैयार की गई है। इन्हीं बुनियादी सिद्धांतों में से एक सिद्धांत (पृष्ठ 5) में लिखा है:

“full equity and inclusion as the cornerstone of all educational decisions to ensure that all students are able to thrive in the education system”.

अर्थात, “सभी शैक्षिक फ़ैसलों का मुख्य आधार पूरी तरह से समानता और समावेश को बनाना होगा, ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि सभी विद्यार्थी शिक्षा प्रणाली में बेहतर ढंग से आगे बढ़ सकें।”

इस सिद्धांत के अनुसार, सरकार को ऐसी शिक्षा-नीति बनानी चाहिए जिसमें समानता और समावेशन मुख्य आधार हों, यानी नीतिगत फैसलों में ऐसा कोई पहलू न हो जिससे असमानता बढ़े। लेकिन वास्तविकता इसके विपरीत है। धरातल पर राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 असमानता को बढ़ा रही है। इसके दो मुख्य नीतिगत पहलू हैं: पहला यह कि शिक्षा के लिए कितना बजट दिया जा रहा है, और दूसरा यह कि उस बजट का उपयोग समानता बढ़ाने के लिए हो रहा है या असमानता को और गहरा करने के लिए।

यदि आप शिक्षा बजट का विश्लेषण करें, तो आपको दो मुख्य प्रवृत्तियां देखने को मिलेंगी। पहला रुझान यह है कि शिक्षा के बजट में वास्तविक अर्थों में कोई बढ़ोतरी नहीं हुई है। हालांकि सांकेतिक रूप से आपको आंकड़े बढ़े हुए दिखाई दे सकते हैं, लेकिन महंगाई को समायोजित करने के बाद (वास्तविक अर्थ में) शिक्षा बजट में एक ठहराव साफ नजर आता है।

दूसरा रुझान यह है कि स्कूली शिक्षा को मिलने वाले बजट का उपयोग असमानता को बढ़ाने और शिक्षा में अभिजात्यवाद को बढ़ावा देने के लिए किया जा रहा है। कागज़ पर तो राष्ट्रीय शिक्षा नीति का मूल सिद्धांत शिक्षा के माध्यम से समानता और समावेशन की बात करता है, लेकिन ज़मीन पर यह चुनिंदा ‘एलीट स्कूलों’ और आम जनता के स्कूलों के बीच की खाई को और चौड़ा कर रहा है।

पिछले महीने एक अच्छी किताब देखने में आई I ‘यूनियन बजट्स 2014-24 : ऐन एनालिसिस’ नामक इस किताब के लेखक नीरज जैन हैं और इसे आकार बुक्स ने प्रकाशित किया है।

इस किताब के दसवें अध्याय में वर्ष 2014 से लेकर 2024 तक के शिक्षा-बजट का विश्लेषण किया गया है। यह विश्लेषण हमारे सामने कई ऐसी चौंकाने वाली सच्चाइयां उजागर करता है, जो राष्ट्रीय शिक्षा नीति के अनेक नारों को कागज़ी साबित करती हैं।

नीरज जैन की किताब के पृष्ठ संख्या 147 पर एक ग्राफ दिया हुआ है I 

इस ग्राफ में एक साथ तीन तरह के आंकड़े दर्शाए गए हैं:

  1. एब्सलूट नंबर्स (वास्तविक संख्या) में शिक्षा का बजट।
  2. सरकार के कुल बजट में शिक्षा मंत्रालय के बजट का प्रतिशत।
  3. जीडीपी की तुलना में शिक्षा मंत्रालय के बजट का प्रतिशत।

ग्राफ में गेरुए रंग के बार वर्ष 2014 से 2024 तक के विभिन्न वित्तीय वर्षों में शिक्षा मंत्रालय को मिले बजट को एब्सलूट नंबर्स में दर्शाते हैं। उदाहरण के लिए, बाईं तरफ से पहला बार यह दिखाता है कि साल 2014-15 में शिक्षा मंत्रालय को ₹82,771 करोड़ मिले थे। वहीं, दाईं तरफ का आखिरी गेरुए रंग का बार यह बताता है कि साल 2024-25 में शिक्षा मंत्रालय के लिए ₹1,20,528 करोड़ का बजट अनुमान रखा गया।

इन आंकड़ों को सरसरी तौर पर देखने से ऐसा लगता है कि 2014 से 2024 के बीच शिक्षा का बजट काफी बढ़ा है। यदि आप भी ऐसा ही समझ रहे हैं, तो थोड़ा ठहर जाइए; क्योंकि शिक्षा के बजट में आई वास्तविक गिरावट या बढ़ोतरी को समझने के लिए हमें कुछ अन्य महत्वपूर्ण कारकों पर भी ध्यान देना होगा।

जिन अन्य कारकों पर हमें ध्यान देना चाहिए, उनमें से एक मुख्य कारक यह है कि सरकार के कुल बजट में से शिक्षा को कितने प्रतिशत हिस्सा मिलता है। इस कारक को आपके सामने दिख रहे ग्राफ में लाल रेखा से दर्शाया गया है। साल 2014-15 में शिक्षा के लिए कुल बजट का 4.6% मिला था, जिसे 2024-25 में काफी कम कर दिया गया। साल 2024-25 के बजट अनुमान में शिक्षा को कुल बजट का मात्र 2.5% ही दिया गया है। इसका सीधा मतलब यह हुआ कि 2014 से 2024 के इन 10 सालों में सरकार ने कुल बजट के हिस्से में से शिक्षा को मिलने वाले बजट में लगभग 46% की भारी कटौती की है।

भारत सरकार ने अपनी प्रेस रिलीज में केवल एक ही आंकड़े को जनता के सामने रखा है। उस प्रेस रिलीज में सरकार ने शिक्षा मंत्रालय का बजट ₹82,771 करोड़ से बढ़कर ₹1,20,528 करोड़ हो जाने का दावा तो किया, लेकिन इस आधे-अधूरे आंकड़े से शिक्षा को लेकर सरकार की असली नीयत का पता नहीं चलता। सरकार की असली नीयत तब उजागर होती है जब हम यह देखते हैं कि कुल बजटीय खर्च में शिक्षा की हिस्सेदारी घटी है या बढ़ी है। और जैसा कि हम देख चुके हैं—कुल बजट में शिक्षा के प्रतिशत हिस्सेदारी में 2014 की तुलना में 2024 तक आते-आते 46% की कमी कर दी गई है।

शिक्षा के प्रति सरकार की असली नीयत का पता लगाने के लिए एक और आंकड़े पर भी ध्यान देने की जरूरत है। इसके लिए हमें यह जानना होगा कि 2014 में शिक्षा पर जीडीपी का कितना प्रतिशत खर्च किया जा रहा था और 2024 में कितना खर्च किया गया। आपकी स्क्रीन पर दिख रहे ग्राफ में नीले रंग की रेखा हमें बताती है कि 2014 में शिक्षा बजट जीडीपी का 0.66% था, जिसे 2024 में घटाकर महज 0.37% कर दिया गया। इसका अर्थ यह है कि 2014 की तुलना में 2024 में, जीडीपी के संदर्भ में शिक्षा के बजट में 44% की कटौती की गई है।

यदि केवल एब्सलूट नंबर्स (वास्तविक संख्या) को देखा जाए, तो शिक्षा बजट में बढ़ोतरी का एक भ्रम पैदा होता है; और सरकार ने अपनी प्रेस रिलीज के जरिए ठीक ऐसा ही भ्रम रचकर जनता के सामने परोसा है। लेकिन जब हम इसका विश्लेषण कुल बजटीय आवंटन और जीडीपी के संदर्भ में करते हैं, तो साफ पता चलता है कि 2014 की तुलना में 2024 में शिक्षा के बजट में तकरीबन 45% की वास्तविक कटौती की गई है।

एक तरफ तो भारत सरकार ने जीडीपी और कुल बजटीय आवंटन में से शिक्षा को मिलने वाले बजट में लगभग 45% की कटौती की है, तो दूसरी तरफ वह इस बजट का उपयोग स्कूलों में अभिजात्यवाद को बढ़ावा देने के लिए कर रही है। सरकार देश के स्कूलों को ‘एलीट’ (विशिष्ट) और ‘कॉमन’ (सामान्य) श्रेणियों में और ज्यादा विभाजित कर रही है। इस प्रकार, सरकार शिक्षा के भीतर और शिक्षा के माध्यम से सामाजिक-आर्थिक असमानता को लगातार बढ़ा रही है। 

यह एक तीन कॉलम की एक टेबल दिखाई दे रही होगी। इसके पहले कॉलम में तीन प्रकार के विशिष्ट सरकारी (एलीट) स्कूलों के नाम लिखे हुए हैं। ये स्कूल हैं—केंद्रीय विद्यालय , नवोदय विद्यालय और पीएम श्री स्कूल्स

दूसरे कॉलम में यह दर्शाया गया है कि वर्ष 2023-24 में स्कूली शिक्षा को मिलने वाले कुल बजट का कितना प्रतिशत इन तीन प्रकार के एलीट स्कूलों को आवंटित किया गया। साल 2023-24 में कुल स्कूली शिक्षा बजट का 23.1% हिस्सा इन विशिष्ट स्कूलों को दिया गया था। वहीं अगले वर्ष, यानी 2024-25 के बजट में इसे लगभग 6% और बढ़ाकर 29.1% कर दिया गया।

वर्तमान में इन एलीट स्कूलों की संख्या नीचे दी गई है:

पिछले साल तक देश में कुल सरकारी स्कूलों की संख्या 10 लाख 22 हजार थी। ये तीनों प्रकार के विशिष्ट (एलीट) स्कूल, कुल सरकारी स्कूलों का मात्र 1% हैं, लेकिन इन एक प्रतिशत स्कूलों को कुल स्कूली शिक्षा बजट का 29% हिस्सा दिया जा रहा है।

इन एक प्रतिशत एलीट स्कूलों में सरकारी स्कूलों के केवल 2% विद्यार्थी पढ़ते हैं, जबकि शेष 98% विद्यार्थी सामान्य सरकारी स्कूलों में शिक्षा ग्रहण करते हैं।

इसका सीधा गणित यह हुआ कि सरकारी एलीट स्कूलों में पढ़ने वाले मात्र 2% विद्यार्थियों पर बजट का 29% हिस्सा खर्च किया जा रहा है, और बाकी के सामान्य सरकारी स्कूलों में पढ़ने वाले 98% विद्यार्थियों के लिए केवल 71% बजट बचता है। इसके बावजूद एनईपी -2020 का बुनियादी सिद्धांत यह दावा कर रहा है कि सरकार ने पूर्ण समानता और समावेशन को केंद्र में रखकर यह नीति बनाई है। जबकि हकीकत यह है कि बजट का यह आवंटन समानता और समावेशन के सिद्धांतों के पूरी तरह खिलाफ है।

इस नीतिगत तथ्य को थोड़ी और आसान भाषा में इस तरह समझा जा सकता है:

मान लीजिए सरकार के पास कुल ₹100 हैं और उसे 100 बच्चों को खाना खिलाना है। अब सरकार एक ऐसी नीति बनाती है जिसके तहत वह (विशिष्ट वर्ग के) केवल 2 बच्चों के खाने पर ₹29 खर्च करेगी, और बाकी के 98 बच्चों के भोजन पर महज ₹71 खर्च करेगी।

इस हिसाब से जहाँ एलीट स्कूल के एक बच्चे के हिस्से में ₹14.50 (चौदह रुपये पचास पैसे) वाली थाली आएगी, वहीं सामान्य स्कूल के एक बच्चे के हिस्से में मात्र 72 पैसे वाली थाली आएगी। सरकार की बजटीय नीतियों ने शिक्षा के क्षेत्र में इसी भयानक असमानता को और ज्यादा बढ़ा दिया है।

संक्षेप में कहा जाए तो राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 के दस्तावेज़ों में ‘पूर्ण समानता और समावेशन’ के जितने भी ऊंचे-ऊंचे दावे किए गए हों, धरातल पर बजटीय आवंटन की सच्चाई इसके बिल्कुल विपरीत है. आंकड़े स्पष्ट रूप से दर्शाते हैं कि वास्तविक अर्थों में शिक्षा बजट को बढ़ाने के बजाय, सरकार अपनी नीतियों के माध्यम से स्कूली शिक्षा में एक गहरे अभिजात्यवाद को बढ़ावा दे रही है.

देश के मात्र 1% विशिष्ट (एलीट) सरकारी स्कूलों को कुल बजट का 29% हिस्सा सौंप देना और बाकी 99% सामान्य स्कूलों को हाशिए पर धकेल देना किसी भी दृष्टिकोण से समानता की नीति नहीं कही जा सकती.

जहाँ एलीट स्कूलों के 2% विद्यार्थियों के हिस्से में बजट का एक बड़ा हिस्सा आता है, वहीं सामान्य स्कूलों में पढ़ रहे 98% आम जनता के बच्चे बुनियादी सुविधाओं और सम्मानजनक संसाधनों के लिए संघर्ष करने को मजबूर हैं.

शिक्षा किसी भी लोकतांत्रिक समाज में समता लाने का सबसे बड़ा माध्यम होती है, लेकिन जब राज्य की नीतियां ही ‘चुनिंदा विशिष्ट वर्ग’ और ‘आम बहुसंख्यक वर्ग’ के बीच की खाई को चौड़ा करने लगें, तो वह नीति समावेशी नहीं, बल्कि विभाजनकारी बन जाती है। यदि सरकार वास्तव में भारत के हर बच्चे को बेहतर भविष्य देना चाहती है, तो उसे कागज़ी नैरेटिव और प्रचार की तिजोरियों को बंद कर, बजट का न्यायसंगत वितरण करना होगा। सच्चे अर्थों में शैक्षिक सुधार तभी संभव है जब 70 पैसे और साढ़े चौदह रुपये की थाली का यह अमानवीय अंतर हमेशा के लिए खत्म हो जाए।

(बीरेंद्र सिंह रावत का लेख। रावत दिल्ली-विश्वविद्यालय के शिक्षाशास्त्र विभाग से संबद्ध थे।)

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